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कुछ अर्ज़ है...
अपने हर लफ़्ज़् का ख़ुद आईना हो जाऊँगा...उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा...तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं...मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा...वसीम बरेलवी
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नवाबियत
कतरन...
रिश्तों की कहानी..
14 years ago
प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा
गजरौला टाईम्स में 'देशनामा'
15 years ago
उम्मीद है....
वो खबरें..जो पास से होकर गुजर जाती है..वो खबरें जो शोर नहीं मचाती..
हाथ थामिए उम्मीद है
लखनऊ के नवाब
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Siddharth Rai
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