मंदिर मस्जिद
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंजर क्यूँ है
जख्म हर सर पे, हर हाथ में पत्थर क्यूँ है
जब हकीकत है, के हर जर्रे में तू रहता है,
फिर जमीन पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदिर क्यूँ है
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंजर क्यूँ है
जख्म हर सर पे, हर हाथ में पत्थर क्यूँ है
जब हकीकत है, के हर जर्रे में तू रहता है,
फिर जमीन पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदिर क्यूँ है
Posted by सुबोध at 12:05 PM |
satyendra Yadav said...
सर जी आपकी इन चार लाइनों ने दिल जीत लिया...
25 August, 2008 6:53 PM