Wednesday 13 August 2008

ठंडी हवा आती तो है / दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

दुष्यंत कुमार की एक कविता

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये
मयस्सर = उपलब्ध ; मुतमईन = संतुष्ट ; मुनासिब = ठीक

आंकड़े

आंकड़ों के सहारे झूठ बोलना आसान है...आंकड़ों के बिना सच बोलना मुश्किल है...एंड्रेज डंकेल

Tuesday 12 August 2008

मंदिर मस्जिद

आज के दौर में ऐ दोस्‍त ये मंजर क्‍यूँ है
जख्‍म हर सर पे, हर हाथ में पत्‍थर क्‍यूँ है
जब हकीकत है, के हर जर्रे में तू रहता है,
फिर जमीन पर कहीं मस्‍जिद, कहीं मंदिर क्‍यूँ है

यश..

धन का क्षय तो काल के साथ ही हो जाता है लेकिन यश हमेशा कालजयी होता है

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